शीतला अष्टमी 2027
मंगलवार, 30 मार्च 2027 · 150 दिन बाद
शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा भी कहते हैं, शीतला माता की पूजा का दिन है। इस दिन चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले बना भोजन माता के प्रसाद के रूप में खाया जाता है।
Sheetala Ashtami की पूजाएं, क्रम से
शीतला अष्टमी 2027: तिथि और समय
- तारीख
- मंगलवार, 30 मार्च 2027
- तिथि
- चैत्र कृष्ण अष्टमी
- अष्टमी प्रारंभ
- 29 मार्च, शाम 5:12
- अष्टमी समाप्त
- 30 मार्च, शाम 7:41
- सूर्योदय
- सुबह 6:14
- सूर्यास्त
- शाम 6:37
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
शीतला अष्टमी 2026: तिथि और समय
- तारीख
- बुधवार, 11 मार्च 2026
- तिथि
- चैत्र कृष्ण अष्टमी
- अष्टमी प्रारंभ
- 11 मार्च, रात 1:55
- अष्टमी समाप्त
- 12 मार्च, सुबह 4:20
- सूर्योदय
- सुबह 6:35
- सूर्यास्त
- शाम 6:27
कैसे मनाएं
- एक दिन पहले त्योहार का भोजन बनाकर रसोई का काम पूरा कर लें।
- अष्टमी की सुबह स्नान करके मंदिर में या घर पर शीतला माता की पूजा करें।
- माता को ठंडा जल, रोली, अक्षत, हल्दी और ठंडे भोजन का भोग लगाएँ।
- पूरा परिवार ठंडा भोजन प्रसाद के रूप में खाए और दिन भर चूल्हा न जलाए।
आपकी कुंडली के लिए
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Sheetala Ashtami के बाद आने वाले त्योहार
शीतला अष्टमी के बारे में
शीतला माता को शीतलता देने वाली माँ के रूप में पूजा जाता है। बहुत से परिवार, खासकर गर्मी शुरू होते समय, बच्चों और पूरे घर की अच्छी सेहत के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं। माता को गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, जल का कलश और नीम की पत्तियाँ लिए दिखाया जाता है। उनके नाम का अर्थ ही है ठंडक देने वाली, और पूरा दिन इसी भाव से मनाया जाता है: कुछ भी गरम नहीं पकाया जाता और परिवार पिछले दिन का बना खाना खाता है।
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह त्योहार चैत्र कृष्ण अष्टमी को, होली के लगभग एक हफ़्ते बाद आता है। यह मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत में मनाया जाता है: राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में। बसोड़ा नाम बासी शब्द से बना है, यानी पिछले दिन का रखा भोजन। कुछ परिवार यह पूजा अष्टमी की जगह सप्तमी को करते हैं, और गुजरात के कुछ हिस्सों में ऐसा ही दिन शीतला सातम के नाम से श्रावण महीने में मनाया जाता है। हर घर उसी दिन को मानता है जिसे उसके बड़े मानते आए हैं।
तैयारी एक दिन पहले शुरू होती है। महिलाएँ पूरी, मीठे चावल, राबड़ी, गुलगुले, पुए, दही से बने पकवान और ऐसी चीज़ें बनाती हैं जो रात भर अच्छी रहें, और फिर रसोई का काम समेट देती हैं। अष्टमी की सुबह स्नान करके महिलाएँ शीतला माता के मंदिर जाती हैं या घर पर ही पूजा करती हैं। माता को ठंडा जल, रोली, अक्षत, हल्दी और ठंडे भोजन का भोग चढ़ाया जाता है और शीतला माता की कथा सुनी जाती है। पूजा के बाद पूरा परिवार साथ बैठकर वही ठंडा भोजन प्रसाद के रूप में खाता है और दिन भर चूल्हा नहीं जलाया जाता। कई लोग इस भोजन का एक हिस्सा दूसरों को भी बाँटते हैं।
एक व्यावहारिक बात: खाना एक दिन पहले बनता है, इसलिए क्या बनाना है और उसे कैसे रखना है, यह सोच-समझकर तय करना अच्छा रहता है, ताकि गर्म मौसम में भी सब कुछ ताज़ा रहे। दिन तिथि से तय होता है, और सप्तमी या अष्टमी का चुनाव हर परिवार अपनी परंपरा से करता है।
