छठ पूजा के बारे में
छठ बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा लोकपर्व है। यह दिवाली के छह दिन बाद, कार्तिक शुक्ल पक्ष में आता है। इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा होती है। छठी मैया को संतान और परिवार की देखभाल करने वाली माँ के रूप में पूजा जाता है। आज जहाँ भी इन क्षेत्रों के परिवार बसे हैं, दिल्ली और मुंबई से लेकर विदेशों तक, वहाँ नदी, तालाब या छत पर बने कुंड में छठ मनाया जाता है।
यह पर्व चार दिन चलता है। पहले दिन नहाय खाय होता है: व्रती स्नान करके घर साफ करते हैं और एक बार सात्विक भोजन करते हैं, जिसमें आमतौर पर लौकी की सब्ज़ी, चने की दाल और चावल बनते हैं। दूसरे दिन खरना होता है। दिन भर उपवास के बाद शाम को गुड़ की खीर, जिसे रसियाव कहते हैं, और रोटी का भोग लगता है और यही प्रसाद सबमें बाँटा जाता है। खरना के बाद बहुत से व्रती लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं, जो सुबह के अर्घ्य तक चलता है। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग और बच्चे अक्सर पानी या फल लेकर हल्का व्रत रखते हैं, और इसमें भी छठ की वही श्रद्धा है।
तीसरे दिन संध्या अर्घ्य होता है। घर के लोग बाँस के सूप और दौरे में ठेकुआ, फल, गन्ना और नारियल सजाकर घाट पर जाते हैं। व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। चौथे दिन सुबह उषा अर्घ्य होता है: भोर से पहले सब फिर घाट पर जुटते हैं, उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर प्रसाद लेकर व्रत खोला जाता है।
छठ की पहचान उसकी शुद्धता और सादगी है: घर में बना प्रसाद, साफ-सुथरे घाट, मिट्टी के दीये और घाट जाते हुए महिलाओं के गाए छठ के गीत। इसे सूर्य को जीवन और प्रकाश के लिए धन्यवाद कहने का समय माना जाता है। हर घर की अपनी परंपरा होती है, इसलिए प्रसाद और विधि में थोड़ा-बहुत अंतर दिखता है। इस पेज पर चारों दिन दिए गए हैं, और दोनों अर्घ्य के दिन आपके शहर का सूर्यास्त और सूर्योदय का समय भी।