गोवत्स द्वादशी 2026
गुरुवार, 5 नवंबर 2026 · 5 दिन बाद
गोवत्स द्वादशी की शाम गाय और उसके बछड़े की पूजा होती है, और महाराष्ट्र व गुजरात में यहीं से दीवाली शुरू होती है।
Govatsa Dwadashi की पूजाएं, क्रम से
इस दिन के और मंत्र
- क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा kleem krishnaya govindaya gopijanavallabhaya svaha
गोवत्स द्वादशी 2026: तिथि और समय
- तारीख
- गुरुवार, 5 नवंबर 2026
- तिथि
- कार्तिक कृष्ण द्वादशी
- द्वादशी प्रारंभ
- 5 नवंबर, सुबह 10:36
- द्वादशी समाप्त
- 6 नवंबर, सुबह 10:31
- सूर्योदय
- सुबह 6:35
- सूर्यास्त
- शाम 5:33
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
गोवत्स द्वादशी 2027: तिथि और समय
- तारीख
- मंगलवार, 26 अक्टूबर 2027
- तिथि
- कार्तिक कृष्ण द्वादशी
- द्वादशी प्रारंभ
- 26 अक्टूबर, रात 3:23
- द्वादशी समाप्त
- 27 अक्टूबर, रात 1:04
- सूर्योदय
- सुबह 6:28
- सूर्यास्त
- शाम 5:41
कैसे मनाएं
- गाय और बछड़े को नहलाकर हल्दी, कुमकुम और फूलों से सजाया जाता है।
- गोधूलि में उन्हें हरी घास, गुड़ और रोटी खिलाकर आरती की जाती है।
- बहुत सी महिलाएं व्रत रखती हैं और परंपरा के अनुसार दूध से बनी चीजें नहीं लेतीं।
- महाराष्ट्र में दरवाजे पर रंगोली बनती है और दीवाली के पहले दीये जलते हैं।
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Govatsa Dwadashi के बाद आने वाले त्योहार
गोवत्स द्वादशी के बारे में
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार गोवत्स द्वादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आती है, जो पश्चिम और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण पक्ष कहलाता है। यह धनतेरस से एक दिन पहले आती है, और धनतेरस आमतौर पर दीवाली से दो दिन पहले होता है। गो का अर्थ है गाय और वत्स का बछड़ा। भारतीय घरों में गाय को पोषण देने वाली और मां की ममता का रूप माना जाता रहा है, और यह दिन गाय और बछड़े के प्रति आभार जताने का है। पूजी जाने वाली गाय को अक्सर कामधेनु की बेटी नंदिनी का रूप माना जाता है।
महाराष्ट्र में इस दिन को वसु बारस कहते हैं और यहीं से दीवाली का उत्सव शुरू होता है। दरवाजे पर रंगोली सजती है और पहले दीये जलते हैं। गुजरात में यही दिन वाघ बारस के नाम से दीवाली के दिनों में गिना जाता है। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में गाय बछड़े की पूजा के लिए बछ बारस नाम चलता है, पर कई जगह बछ बारस भाद्रपद में मनाई जाती है, इसलिए परिवार अपने इलाके की परंपरा मानते हैं।
पूजा गोधूलि बेला में होती है, जब गायें खेतों से घर लौटती हैं। गाय और बछड़े को नहलाकर हल्दी, कुमकुम, फूल और माला से सजाया जाता है, और उन्हें हरी घास, गुड़ और गेहूं या बाजरे की रोटी खिलाई जाती है। महिलाएं उनकी आरती उतारती हैं और अपने बच्चों व घर-परिवार की कुशलता की कामना करती हैं। जिनके घर गाय नहीं है, वे गौशाला या पड़ोस की गाय की पूजा करते हैं, या मिट्टी की गाय बछड़े की छोटी मूर्ति पूजते हैं।
बहुत सी महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं। कई इलाकों में दूध, दही और गाय से मिलने वाली दूसरी चीजें नहीं ली जातीं, कुछ घरों में गेहूं भी नहीं खाया जाता। इसकी जगह बाजरा, अंकुरित मूंग और दूसरे अनाज बनते हैं, ताकि बछड़े को अपनी मां का पूरा दूध मिले।
दिन उस द्वादशी तिथि से तय होता है जो गोधूलि के समय मौजूद हो, क्योंकि पूजा उसी समय होती है।
