वट पूर्णिमा व्रत 2027
शुक्रवार, 18 जून 2027 · 230 दिन बाद
वट पूर्णिमा वह दिन है जब पश्चिम भारत की सुहागिनें बरगद के पेड़ के पास इकट्ठा होकर उस पर सूत लपेटती हैं और सावित्री की निष्ठा को याद करती हैं।
Vat Purnima Vrat की पूजाएं, क्रम से
इस दिन के और मंत्र
- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय... Chandra mantra
- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये... Lakshmi mantra
- ॐ ह्रीं ज्येष्ठायै नमः om hreem jyeshthayai namah
- ॐ ह्रीं नमो भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णे... Annapurna mantra
वट पूर्णिमा व्रत 2027: तिथि और समय
- तारीख
- शुक्रवार, 18 जून 2027
- तिथि
- ज्येष्ठ पूर्णिमा
- पूर्णिमा प्रारंभ
- 18 जून, सुबह 4:35
- पूर्णिमा समाप्त
- 19 जून, सुबह 6:15
- सूर्योदय
- सुबह 5:23
- सूर्यास्त
- शाम 7:21
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
वट पूर्णिमा व्रत 2026: तिथि और समय
- तारीख
- सोमवार, 29 जून 2026
- तिथि
- ज्येष्ठ पूर्णिमा
- पूर्णिमा प्रारंभ
- 29 जून, रात 3:07
- पूर्णिमा समाप्त
- 30 जून, सुबह 5:27
- सूर्योदय
- सुबह 5:26
- सूर्यास्त
- शाम 7:22
कैसे मनाएं
- सुबह स्नान करके पारंपरिक साड़ी, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ और कुमकुम धारण किया जाता है।
- थाली में हल्दी, कुमकुम, फूल, अक्षत, फल, मिठाई और सफेद सूत रखा जाता है।
- बरगद की जड़ में जल और फूल चढ़ाकर परिक्रमा करते हुए तने पर सूत लपेटा जाता है।
- महिलाएँ एक-दूसरे को हल्दी-कुमकुम लगाती हैं और फल व छोटे उपहार बाँटती हैं।
- सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है और घर की रीत के अनुसार व्रत रखा जाता है।
आपकी कुंडली के लिए
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Vat Purnima Vrat के बाद आने वाले त्योहार
वट पूर्णिमा व्रत के बारे में
वट पूर्णिमा की कथा वही है जो उत्तर भारत के वट सावित्री व्रत की है। सावित्री ने यह जानते हुए भी सत्यवान से विवाह किया कि उसकी आयु कम है। जब वह दिन आया और यमराज सत्यवान के प्राण ले चले, तो सावित्री उनके पीछे चलती रही। उसकी आस्था और समझदारी भरी बातों से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे वर दिए और अंत में सत्यवान को लौटा दिया। पीढ़ियों से महिलाएँ यह दिन पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य की कामना के साथ मनाती आई हैं।
यह व्रत ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक में रखा जाता है। उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को होता है, और यह उसके पंद्रह दिन बाद आता है। यह अंतर हर क्षेत्र की पीढ़ियों पुरानी परंपरा से आता है, व्रत के भाव में कोई फर्क नहीं है। कथा, भावना और बरगद, सब एक ही हैं।
इस दिन सुबह महिलाएँ पारंपरिक साड़ी पहनती हैं, मंगलसूत्र, हरी चूड़ियाँ और कुमकुम लगाती हैं, और पूजा की थाली लेकर मंदिर के आँगन या मोहल्ले के बरगद के पास जाती हैं। थाली में हल्दी, कुमकुम, फूल, अक्षत, फल, मिठाई और सफेद सूत की लच्छी रहती है। जड़ में जल और फूल चढ़ाकर महिलाएँ पेड़ की परिक्रमा करती हैं और साथ-साथ सूत लपेटती जाती हैं, अक्सर सात बार। इसके बाद वे एक-दूसरे को हल्दी-कुमकुम लगाती हैं और फल व छोटे उपहार बाँटती हैं। इस तरह यह सुबह पूजा के साथ-साथ सखियों और पड़ोसिनों के मिलने का मौका भी बन जाती है। बरगद की छाँव में बैठकर सावित्री की कथा सुनी जाती है।
कई महिलाएँ दिन भर व्रत रखती हैं, कुछ केवल फल या दूध लेती हैं, और कुछ घरों में यह व्रत त्रयोदशी से तीन दिन तक चलता है। जहाँ आसपास बरगद न हो, वहाँ कुछ महिलाएँ घर पर बरगद के चित्र के सामने पूजा कर लेती हैं। व्रत का दिन आपके शहर में पूर्णिमा तिथि के समय से तय होता है, इसलिए ऊपर दी गई तारीख ही मानें।
