वट सावित्री व्रत 2027
शुक्रवार, 4 जून 2027 · 216 दिन बाद
वट सावित्री व्रत उत्तर भारत की सुहागिनों का वह दिन है जब वे उपवास रखकर बरगद की पूजा करती हैं और उस सावित्री को याद करती हैं, जिसने अपने पति सत्यवान का साथ नहीं छोड़ा।
Vat Savitri Vrat की पूजाएं, क्रम से
इस दिन के और मंत्र
- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय... Chandra mantra
- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये... Lakshmi mantra
- ॐ ह्रीं ज्येष्ठायै नमः om hreem jyeshthayai namah
- ॐ ह्रीं नमो भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णे... Annapurna mantra
वट सावित्री व्रत 2027: तिथि और समय
- तारीख
- शुक्रवार, 4 जून 2027
- तिथि
- ज्येष्ठ अमावस्या
- अमावस्या प्रारंभ
- 4 जून, सुबह 4:06
- अमावस्या समाप्त
- 5 जून, रात 1:10
- सूर्योदय
- सुबह 5:23
- सूर्यास्त
- शाम 7:15
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
वट सावित्री व्रत 2026: तिथि और समय
- तारीख
- शनिवार, 16 मई 2026
- तिथि
- ज्येष्ठ अमावस्या
- अमावस्या प्रारंभ
- 16 मई, सुबह 5:12
- अमावस्या समाप्त
- 17 मई, रात 1:31
- सूर्योदय
- सुबह 5:30
- सूर्यास्त
- शाम 7:05
कैसे मनाएं
- सुबह स्नान के बाद महिलाएँ नए या शादी के कपड़े पहनती हैं और सिंदूर, चूड़ी जैसे सुहाग के चिह्न धारण करती हैं।
- पूजा की थाली में जल, रोली, अक्षत, फूल, भीगे चने, फल और मिठाई सजाई जाती है।
- बरगद के पेड़ पर पूजा करके कच्चा सूत लपेटते हुए उसकी परिक्रमा की जाती है।
- सावित्री और सत्यवान की कथा पढ़ी या सुनी जाती है।
- पूजा के बाद व्रत खोला जाता है और घर के बड़े आशीर्वाद देते हैं।
आपकी कुंडली के लिए
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Vat Savitri Vrat के बाद आने वाले त्योहार
वट सावित्री व्रत के बारे में
इस व्रत के पीछे सावित्री और सत्यवान की कथा है। राजकुमारी सावित्री ने सत्यवान को पति के रूप में चुना, जबकि उसे बता दिया गया था कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है। जिस दिन वह घड़ी आई, सावित्री पति के साथ वन गई। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चले, तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। उसकी निष्ठा, समझदारी भरी बातों और अडिग संकल्प से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे एक-एक कर वर दिए और अंत में सत्यवान के प्राण लौटा दिए। इसी भाव से महिलाएँ पति की लंबी आयु और घर-परिवार की खुशहाली की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में, जहाँ पूर्णिमांत पंचांग चलता है, यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में यही व्रत पंद्रह दिन बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। कथा और पूजा वही है, बस दिन अलग है।
बरगद को इसलिए चुना जाता है क्योंकि यह पेड़ सदियों तक जीता है और अपनी जटाओं से नई जड़ें बनाता रहता है। मान्यता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास है। इस दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं, कई अपनी शादी का जोड़ा भी पहनती हैं, और पूजा की थाली लेकर बरगद के पास इकट्ठा होती हैं। जल, रोली, अक्षत, फूल, भीगे चने, फल और मिठाई चढ़ाई जाती है। फिर कच्चा सूत लपेटते हुए पेड़ की परिक्रमा की जाती है, अक्सर सात बार या उससे अधिक। घर या मोहल्ले की कोई बड़ी महिला सावित्री-सत्यवान की कथा सुनाती है और सब मिलकर सुनती हैं। कई महिलाएँ दिन भर उपवास रखती हैं और पूजा के बाद ही भोजन करती हैं।
कुछ परिवारों में यह व्रत त्रयोदशी से शुरू होकर तीन दिन चलता है, तो कहीं केवल अमावस्या के दिन रखा जाता है। व्रत का दिन आपके शहर में अमावस्या तिथि के समय से तय होता है, इसलिए ऊपर दी गई तारीख और अपने घर की परंपरा, दोनों को साथ रखकर चलें।
