चेटी चंड 2027
गुरुवार, 8 अप्रैल 2027 · 159 दिन बाद
चेटी चंड सिंधी समाज का नया साल है और भगवान झूलेलाल के जन्म का उत्सव भी। नए चाँद की पहली झलक, आयो लाल झूलेलाल के जयकारे और जल को अर्पित भेंट, यही इस दिन की पहचान है।
Cheti Chand की पूजाएं, क्रम से
चेटी चंड 2027: तिथि और समय
- तारीख
- गुरुवार, 8 अप्रैल 2027
- तिथि
- चैत्र शुक्ल द्वितीया
- द्वितीया प्रारंभ
- 8 अप्रैल, सुबह 4:29
- द्वितीया समाप्त
- 9 अप्रैल, रात 3:11
- सूर्योदय
- सुबह 6:03
- सूर्यास्त
- शाम 6:42
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
चेटी चंड 2026: तिथि और समय
- तारीख
- शुक्रवार, 20 मार्च 2026
- तिथि
- चैत्र शुक्ल द्वितीया
- द्वितीया प्रारंभ
- 20 मार्च, सुबह 4:53
- द्वितीया समाप्त
- 21 मार्च, रात 2:31
- सूर्योदय
- सुबह 6:25
- सूर्यास्त
- शाम 6:32
कैसे मनाएं
- झूलेलाल मंदिर या टिकाणे पर जाकर पूजा करें।
- दीपक, मिश्री, फल, फूल और कलश से बहराणा साहिब सजाएँ।
- शोभायात्रा के साथ जल तक जाएँ और प्रार्थना के साथ बहराणा अर्पित करें।
- ताहिरी बनाकर परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
- बड़ों से आशीर्वाद लें और नए साल की मिठाई बाँटें।
आपकी कुंडली के लिए
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Cheti Chand के बाद आने वाले त्योहार
चेटी चंड के बारे में
चेटी चंड का नाम चेट और चंड से बना है। सिंधी में चैत्र को चेट और चाँद को चंड कहते हैं। यह चैत्र अमावस्या के बाद पहला चाँद दिखने वाले दिन मनाया जाता है, जो आमतौर पर चैत्र शुक्ल द्वितीया होती है। सिंधी हिंदुओं के लिए यह नववर्ष भी है और झूलेलाल जी का जन्मदिन भी। झूलेलाल जी को उडेरोलाल, दरियालाल और ज़िंदा पीर भी कहा जाता है और उन्हें जल के देवता वरुण का रूप माना जाता है।
सिंधी घरों में कथा कही जाती है कि एक समय सिंध के लोगों पर एक कठोर शासक का दबाव था, जो चाहता था कि वे अपना धर्म छोड़ दें। लोगों ने सिंधु नदी के किनारे प्रार्थना की, और माना जाता है कि उसी के उत्तर में झूलेलाल जी का जन्म हुआ। बड़े होकर उन्होंने बड़े साहस से शासक को यह स्वीकार करवाया कि हर व्यक्ति को अपने ढंग से पूजा करने की स्वतंत्रता है। उन्हें रक्षक और मेलजोल के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
इस दिन परिवार झूलेलाल मंदिर या टिकाणे पर जाकर पूजा करते हैं। मुख्य विधि बहराणा साहिब की है: एक थाल में जलता दीपक, मिश्री, इलायची, फल, फूल और कपड़े में लिपटे नारियल वाला कलश रखा जाता है। इसे गाजे-बाजे के साथ, नाचते-गाते हुए नदी, तालाब या समुद्र तक ले जाया जाता है और प्रार्थना के साथ जल को अर्पित किया जाता है। यह याद दिलाता है कि जीवन जल पर कितना टिका है। गलियाँ आयो लाल झूलेलाल के जयकारों से गूँज उठती हैं।
घरों में मीठे चावल यानी ताहिरी और दूसरे सिंधी पकवान बनते हैं। कई जगह मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक भोज भी होते हैं।
यह त्योहार नए चाँद के दर्शन से जुड़ा है, इसलिए हर साल इसका दिन चैत्र शुक्ल द्वितीया की तिथि से तय होता है। शोभायात्रा का समय और तरीका हर शहर की सिंधी पंचायत और मंदिर अपनी परंपरा के अनुसार रखते हैं।
