गुड़ी पड़वा 2027
बुधवार, 7 अप्रैल 2027 · 158 दिन बाद
गुढी पाडवा मराठी और कोंकणी घरों का नया साल है। सुबह-सुबह घर के दरवाज़े पर गुढी खड़ी की जाती है, जो आने वाले साल के स्वागत की ध्वजा है।
Gudi Padwa की पूजाएं, क्रम से
इस दिन के और मंत्र
- क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं... Dakshina Kali mantra
- हसैं हसकरीं हसरौ ह्सकरीं हसौं hasaim hasakareem hasaraum hasakareem hasaum
गुड़ी पड़वा 2027: तिथि और समय
- तारीख
- बुधवार, 7 अप्रैल 2027
- तिथि
- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
- प्रतिपदा प्रारंभ
- 7 अप्रैल, सुबह 5:21
- प्रतिपदा समाप्त
- 8 अप्रैल, सुबह 4:29
- सूर्योदय
- सुबह 6:05
- सूर्यास्त
- शाम 6:42
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
गुड़ी पड़वा 2026: तिथि और समय
- तारीख
- गुरुवार, 19 मार्च 2026
- तिथि
- चैत्र अमावस्या
- अमावस्या प्रारंभ
- 18 मार्च, सुबह 8:26
- अमावस्या समाप्त
- 19 मार्च, सुबह 6:54
- सूर्योदय
- सुबह 6:26
- सूर्यास्त
- शाम 6:31
कैसे मनाएं
- सुबह तेल-स्नान करें और दरवाज़े पर रंगोली और आम के पत्तों का तोरण सजाएँ।
- कपड़ा, नीम, फूल, गाठी की माला और उल्टे लोटे से सजी गुढी द्वार या खिड़की पर खड़ी करें।
- हल्दी, कुमकुम और फूलों से गुढी की पूजा कर नए साल के लिए प्रार्थना करें।
- पहले नीम-गुड़ चखें, फिर पूरनपोली या श्रीखंड परिवार के साथ बाँटें।
- सूर्यास्त से पहले प्रणाम करके गुढी उतार लें।
आपकी कुंडली के लिए
अपनी जन्म की जानकारी जोड़ें और देखें कि Gudi Padwa आपके जन्म नक्षत्र या जन्म तिथि से मेल खाता है या नहीं।
Gudi Padwa के बाद आने वाले त्योहार
गुड़ी पड़वा के बारे में
गुढी पाडवा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह नववर्ष है, और गोवा तथा कोंकण तट के कोंकणी परिवार इसे संवत्सर पाडवो के नाम से मनाते हैं। इसी दिन कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उगादि मनाया जाता है और उत्तर भारत में चैत्र नवरात्रि शुरू होती है।
इस दिन से कई कथाएँ जुड़ी हैं। माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। बहुत से लोग इसे विजय और घर लौटने के आनंद का दिन मानते हैं और गुढी को उसी खुशी की ध्वजा के रूप में देखते हैं। इसी दिन से शालिवाहन शक संवत का नया वर्ष भी शुरू होता है, जो दक्कन में लंबे समय से चलता आया है।
गुढी बनाने का तरीका सीधा और सुंदर है। एक लंबे बाँस के सिरे पर रंगीन रेशमी या सूती कपड़ा बाँधा जाता है, उस पर नीम और आम के पत्ते, फूलों की माला और शक्कर की गाठी की माला सजाई जाती है, और सबसे ऊपर ताँबे या चाँदी का लोटा उल्टा रखा जाता है। इसे मुख्य दरवाज़े, खिड़की या छत पर ऐसे लगाते हैं कि बाहर से दिखे, और हल्दी, कुमकुम और फूलों से इसकी पूजा करते हैं। सूर्यास्त से पहले गुढी उतार ली जाती है।
सुबह तेल लगाकर स्नान किया जाता है, नए कपड़े पहने जाते हैं और दरवाज़े पर रंगोली और आम के पत्तों का तोरण सजता है। सबसे पहले नीम की पत्तियों में गुड़ और इमली मिलाकर बना मिश्रण खाया जाता है, जो याद दिलाता है कि साल में कड़वे और मीठे, दोनों तरह के दिन आएँगे। फिर पूरनपोली, श्रीखंड-पूरी जैसे पकवान बनते हैं और पड़ोसियों में मिठाई बाँटी जाती है। कई शहरों में पारंपरिक वेशभूषा में शोभायात्राएँ भी निकलती हैं।
आमतौर पर गुढी पाडवा उसी दिन मनाया जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो। गुढी सजाने का ढंग हर घर में थोड़ा अलग होता है और हर परिवार अपनी परंपरा के अनुसार ही इसे खड़ा करता है।
