राम नवमी के बारे में
रामनवमी चैत्र शुक्ल नवमी को आती है, जो चैत्र नवरात्रि का अंतिम दिन है। इसी दिन अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम का जन्म हुआ था। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, और सीता, लक्ष्मण और हनुमान के साथ उनकी कथा भारत के घर-घर में बसी है।
कथा है कि संतान की इच्छा से राजा दशरथ ने यज्ञ कराया। यज्ञ से मिली खीर उन्होंने तीनों रानियों में बाँटी। कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। माना जाता है कि श्रीराम का जन्म दोपहर में हुआ था, इसलिए मुख्य पूजा उसी समय होती है।
उत्तर भारत में कई घरों और मंदिरों में नवमी से पहले रामकथा का अखंड पाठ होता है, जो नवमी को पूरा होता है। दोपहर के समय रामलला की छोटी मूर्ति को सजे हुए पालने में रखकर धीरे-धीरे झुलाया जाता है, सोहर और बधाई गीत गाए जाते हैं और फूल, तुलसी और मिठाई अर्पित की जाती है। बहुत से लोग दोपहर की पूजा तक या पूरे दिन व्रत रखते हैं और फलाहार करते हैं। अयोध्या में भारी भीड़ उमड़ती है, श्रद्धालु सरयू में स्नान करते हैं, और कई शहरों में राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की झाँकियों के साथ शोभायात्राएँ निकलती हैं।
दक्षिण भारत में यह दिन अपने ढंग से मनाया जाता है। गुड़, काली मिर्च और इलायची से बना पानकम और मसालेदार छाछ यानी नीर मोर भगवान को अर्पित करके आने वालों में बाँटे जाते हैं। तेलंगाना के भद्राचलम और कई दूसरे मंदिरों में इस दिन सीता-राम कल्याणम, यानी सीता और राम का विवाहोत्सव, धूमधाम से होता है।
रामनवमी उस दिन मनाई जाती है जिस दिन दोपहर के समय नवमी तिथि हो, इसलिए ऊपर दिया मध्याह्न मुहूर्त पूजा के लिए अहम है। व्रत और पूजा का तरीका हर परिवार अपनी परंपरा से तय करता है।