लोहड़ी 2027
गुरुवार, 14 जनवरी 2027 · 75 दिन बाद
लोहड़ी पंजाब की अलाव वाली रात है, जो मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है। परिवार और पड़ोसी आग के चारों ओर जुटते हैं, रेवड़ी, गजक और फुल्ले बाँटते हैं और दुल्ला भट्टी के पुराने गीत गाते हैं।
Lohri की पूजाएं, क्रम से
लोहड़ी 2027: तिथि और समय
- तारीख
- गुरुवार, 14 जनवरी 2027
- तिथि
- पौष शुक्ल षष्ठी
- षष्ठी प्रारंभ
- 13 जनवरी, दोपहर 1:03
- षष्ठी समाप्त
- 14 जनवरी, दोपहर 1:59
- सूर्योदय
- सुबह 7:15
- सूर्यास्त
- शाम 5:45
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
लोहड़ी 2026: तिथि और समय
- तारीख
- मंगलवार, 13 जनवरी 2026
- तिथि
- माघ कृष्ण दशमी
- दशमी प्रारंभ
- 12 जनवरी, दोपहर 12:43
- दशमी समाप्त
- 13 जनवरी, दोपहर 3:19
- सूर्योदय
- सुबह 7:15
- सूर्यास्त
- शाम 5:44
कैसे मनाएं
- शाम को परिवार और पड़ोसियों के साथ अलाव जलाएँ।
- आग की परिक्रमा करें और उसमें तिल, रेवड़ी, गजक, मूँगफली और फुल्ले डालें।
- लोहड़ी के गीत गाएँ और गाते हुए आए बच्चों को मिठाई दें।
- नवजात या नवविवाहित जोड़े की पहली लोहड़ी रिश्तेदारों के साथ मिठाई बाँटकर मनाएँ।
आपकी कुंडली के लिए
अपनी जन्म की जानकारी जोड़ें और देखें कि Lohri आपके जन्म नक्षत्र या जन्म तिथि से मेल खाता है या नहीं।
Lohri के बाद आने वाले त्योहार
लोहड़ी के बारे में
लोहड़ी कड़ाके की सर्दी के ढलने और दिनों के लंबे होने की शुरुआत का त्योहार है। पंजाब के किसान परिवारों के लिए यह खेतों में लहलहाती रबी की फसल और गन्ने की कटाई का धन्यवाद भी है, इसीलिए गुड़ और गन्ने से बनी चीज़ें इसमें खास जगह रखती हैं। आग को गर्माहट और बरकत देने वाली मानकर पूजा जाता है, और उसमें डाली गई हर आहुति साल भर की मेहनत का शुक्रिया और आने वाले मौसम की उम्मीद होती है।
लोहड़ी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और दिल्ली में मनाई जाती है, और दुनिया में जहाँ भी पंजाबी परिवार हैं, वहाँ इसकी रौनक दिखती है। इसके सबसे मशहूर गीत दुल्ला भट्टी के हैं, जो पंजाब के लोकनायक थे। उन्हें इसलिए याद किया जाता है कि उन्होंने बेची जा रही लड़कियों को बचाया और पिता की तरह उनकी शादी करवाई। बच्चे घर-घर जाकर सुंदर मुंदरिये हो गाते हैं और बदले में उन्हें रेवड़ी, मूँगफली, मिठाई या कुछ पैसे मिलते हैं।
शाम को आँगन या गली में अलाव जलाया जाता है। लोग उसकी परिक्रमा करते हैं और आग में तिल, रेवड़ी, गजक, मूँगफली और मक्की के फुल्ले डालते हैं, और कुछ खुद भी खाते हैं। ढोल की थाप पर भंगड़ा और गिद्धा होता है और देर रात तक गीत चलते हैं। रात के खाने में अक्सर सरसों का साग और मक्की की रोटी बनती है, और अगले दिन माघी पर बहुत से घरों में गन्ने के रस में पकी खीर, यानी रौ दी खीर, खाई जाती है। नवजात बच्चे या नई शादी के जोड़े की पहली लोहड़ी खास धूमधाम से मनाई जाती है: रिश्तेदार बुलाए जाते हैं, मिठाई बँटती है और पूरा जश्न उन्हीं के इर्द-गिर्द होता है। आजकल बहुत से परिवार बेटी की पहली लोहड़ी भी उतने ही चाव से मनाते हैं।
एक व्यावहारिक बात: लोहड़ी सौर पंचांग से चलती है, इसलिए यह उस शाम मनाई जाती है जिसके बाद सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। अगर सूर्य का प्रवेश एक दिन आगे-पीछे होता है, तो लोहड़ी की तारीख भी उसी के साथ बदल जाती है।
