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व्रत · Bhadrapad Shukla Tritiya

हरतालिका तीज 2027

शुक्रवार, 3 सितंबर 2027 · 307 दिन बाद

Parvatiव्रतNorth India
Delhi · समय IST में

हरतालिका तीज माता पार्वती की उस कठिन तपस्या की याद है जिससे उन्होंने शिव को पाया। इस दिन महिलाएं दिन भर का व्रत, शाम की पूजा और रात भर का जागरण करती हैं।

Hartalika Teej की पूजाएं, क्रम से

अपने इष्ट देव की पूजा भी जोड़ें

कई परिवार त्योहार के दिन अपने इष्ट देव की भी पूजा करते हैं। हर नाम पर विधि, मंत्र और आरती के साथ पूरी जानकारी खुलती है।

इस दिन के और मंत्र

  • ऐं क्लीं सौः aim kleem sauh
  • ॐ ह्रीं नमो भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णे... Annapurna mantra
  • ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः... Mritunjaya mantra

हरतालिका तीज 2027: तिथि और समय

तारीख
शुक्रवार, 3 सितंबर 2027
तिथि
भाद्रपद शुक्ल तृतीया
तृतीया प्रारंभ
2 सितंबर, शाम 4:51
तृतीया समाप्त
3 सितंबर, दोपहर 2:20
सूर्योदय
सुबह 6:00
सूर्यास्त
शाम 6:40

समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।

दूसरे वर्ष

हरतालिका तीज 2026: तिथि और समय

तारीख
सोमवार, 14 सितंबर 2026
तिथि
भाद्रपद शुक्ल तृतीया
तृतीया प्रारंभ
13 सितंबर, सुबह 7:09
तृतीया समाप्त
14 सितंबर, सुबह 7:08
सूर्योदय
सुबह 6:05
सूर्यास्त
शाम 6:27

कैसे मनाएं

  1. सुबह जल्दी स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें।
  2. व्रत निर्जला रखा जाता है, या सेहत और परंपरा के अनुसार हल्के रूप में।
  3. शाम को मिट्टी या रेत से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमाएं बनाकर फुलेरा के नीचे रखी जाती हैं।
  4. व्रत कथा सुनी जाती है और रात भजन-कीर्तन के साथ जागकर बिताई जाती है।
  5. अगली सुबह पूजा के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन करके व्रत खोला जाता है।

आपकी कुंडली के लिए

अपनी जन्म की जानकारी जोड़ें और देखें कि Hartalika Teej आपके जन्म नक्षत्र या जन्म तिथि से मेल खाता है या नहीं।

Hartalika Teej के बाद आने वाले त्योहार

हरतालिका तीज के बारे में

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज मनाई जाती है। इसकी कथा माता पार्वती से जुड़ी है। पार्वती जी मन ही मन शिव को अपना चुकी थीं, पर उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। तब उनकी एक सखी उन्हें घर से दूर वन में ले गई, ताकि वे बिना रुकावट तप कर सकें। 'हरत' यानी हर ले जाना और 'आलिका' यानी सखी, इन्हीं दो शब्दों से इस व्रत का नाम बना। माना जाता है कि इसी तिथि पर पार्वती जी ने रेत का शिवलिंग बनाकर पूरी रात पूजा की और शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

यह व्रत मुख्य रूप से महिलाएं रखती हैं। सुहागिनें पति की लंबी आयु और घर-परिवार की खुशहाली के लिए यह व्रत करती हैं, और कई कुंवारी लड़कियां मनचाहे जीवनसाथी की कामना से इसे रखती हैं, जैसे पार्वती जी ने रखा था। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में यह बड़े मन से मनाया जाता है। कर्नाटक में इसी दिन गौरी हब्बा होता है, जब गणेश जी के आने से एक दिन पहले गौरी माता का घर में स्वागत किया जाता है।

ज़्यादातर महिलाएं यह व्रत निर्जला रखती हैं, यानी सूर्योदय से अगली सुबह तक न अन्न, न जल। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएं और बहुत सी दूसरी महिलाएं भी अपनी सेहत और घर की परंपरा के अनुसार जल या फल लेकर हल्का व्रत रखती हैं। शाम को सोलह श्रृंगार करके महिलाएं इकट्ठा होती हैं और मिट्टी या रेत से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमाएं बनाती हैं। इन्हें फूल-पत्तियों से सजे फुलेरा के नीचे रखा जाता है। बेलपत्र, फूल और सुहाग की सामग्री चढ़ाकर पूजा होती है, व्रत कथा सुनी जाती है और फिर रात भर भजन-कीर्तन और लोकगीतों के साथ जागरण चलता है। अगली सुबह पूजा के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन करके व्रत खोला जाता है।

हरतालिका तीज, हरियाली तीज और कजरी तीज से अलग है, जो सावन-भादों में इससे पहले आती हैं। व्रत कितना कड़ा हो और कौन से गीत गाए जाएं, यह हर घर अपनी परंपरा से तय करता है। ऊपर दी गई तारीख तृतीया तिथि के आधार पर है।