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व्रत · Bhadrapad Shukla Panchami

ऋषि पंचमी 2027

शनिवार, 4 सितंबर 2027 · 308 दिन बाद

Saptarishiव्रतपूरे भारत में
Delhi · समय IST में

ऋषि पंचमी सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता का एक शांत दिन है, जिन्हें ज्ञान के पहले गुरुओं के रूप में याद किया जाता है। यह गणेश चतुर्थी के अगले दिन आती है।

Rishi Panchami की पूजाएं, क्रम से

अपने इष्ट देव की पूजा भी जोड़ें

कई परिवार त्योहार के दिन अपने इष्ट देव की भी पूजा करते हैं। हर नाम पर विधि, मंत्र और आरती के साथ पूरी जानकारी खुलती है।

ऋषि पंचमी 2027: तिथि और समय

तारीख
शनिवार, 4 सितंबर 2027
तिथि
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
चतुर्थी प्रारंभ
3 सितंबर, दोपहर 2:20
चतुर्थी समाप्त
4 सितंबर, दोपहर 12:26
सूर्योदय
सुबह 6:00
सूर्यास्त
शाम 6:39

समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।

दूसरे वर्ष

ऋषि पंचमी 2026: तिथि और समय

तारीख
मंगलवार, 15 सितंबर 2026
तिथि
भाद्रपद शुक्ल पंचमी
पंचमी प्रारंभ
15 सितंबर, सुबह 7:45
पंचमी समाप्त
16 सितंबर, सुबह 9:00
सूर्योदय
सुबह 6:06
सूर्यास्त
शाम 6:26

कैसे मनाएं

  1. सुबह जल्दी स्नान किया जाता है, और कुछ महिलाएं जड़ी-बूटियों से नहाने की रीत निभाती हैं।
  2. दोपहर में हल्दी, कुमकुम और चावल से सप्तऋषि और अरुंधती की आकृति बनाई जाती है, या सात सुपारियां रखी जाती हैं।
  3. फूल, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करके व्रत कथा पढ़ी जाती है।
  4. दिन का भोजन सादा रखा जाता है, अक्सर बिना हल चलाए उगा अन्न और सब्ज़ी।

आपकी कुंडली के लिए

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Rishi Panchami के बाद आने वाले त्योहार

ऋषि पंचमी के बारे में

भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। यह दिन सात महान ऋषियों, यानी सप्तऋषियों को समर्पित है: कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ। उनके साथ वशिष्ठ ऋषि की पत्नी अरुंधती की भी पूजा होती है, जिन्हें उनकी निष्ठा के लिए याद किया जाता है। माना जाता है कि ज्ञान, प्रार्थना और अच्छे आचरण की परंपरा इन्हीं ऋषियों से पीढ़ी दर पीढ़ी हम तक पहुंची, और यह दिन उन्हें धन्यवाद कहने का है।

यह व्रत ज़्यादातर महिलाएं रखती हैं, खास तौर पर महाराष्ट्र और नेपाल में, और उत्तर तथा पश्चिम भारत के बहुत से घरों में भी। कई महिलाएं इसे तय वर्षों तक हर साल रखती हैं और फिर एक छोटे से अनुष्ठान के साथ व्रत का उद्यापन करती हैं। यह कोई बड़ा सार्वजनिक उत्सव नहीं, बल्कि घर की शांत, निजी पूजा है।

दिन की शुरुआत सुबह जल्दी स्नान से होती है। कई जगह नदी में स्नान किया जाता है, या घर पर ही पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर नहाया जाता है। कुछ महिलाएं अपामार्ग यानी चिरचिटा की दातुन करने और जड़ी-बूटियों से स्नान करने की पुरानी रीत निभाती हैं। मुख्य पूजा दोपहर में होती है। साफ जगह पर हल्दी, कुमकुम और चावल से सप्तऋषियों की आकृति बनाई जाती है, या सात सुपारियां रखकर उन्हें ऋषियों का रूप माना जाता है। फिर फूल, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा होती है और व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है।

इस दिन का भोजन बहुत सादा रहता है। कई महिलाएं वही अन्न और सब्ज़ियां खाती हैं जो बिना हल चलाए उगी हों। महाराष्ट्र में इस दिन कई सब्ज़ियों को मिलाकर ऋषि पंचमी की भाजी बनाई जाती है। कुछ महिलाएं फल और दूध लेकर या एक समय भोजन करके व्रत रखती हैं।

हर परिवार की रीत थोड़ी अलग होती है और हर घर वही निभाता है जो बड़ों से मिला है। ऊपर दी गई तारीख दोपहर के समय की पंचमी तिथि पर आधारित है, क्योंकि मुख्य पूजा इसी समय होती है।