राधा अष्टमी 2027
बुधवार, 8 सितंबर 2027 · 312 दिन बाद
जन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद ब्रज फिर से झूम उठता है। राधा अष्टमी श्री राधा के प्राकट्य का दिन है, जो कृष्ण की प्रिया और ब्रज की भक्ति का हृदय हैं।
Radha Ashtami की पूजाएं, क्रम से
राधा अष्टमी 2027: तिथि और समय
- तारीख
- बुधवार, 8 सितंबर 2027
- तिथि
- भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
- अष्टमी प्रारंभ
- 7 सितंबर, सुबह 11:29
- अष्टमी समाप्त
- 8 सितंबर, दोपहर 12:45
- सूर्योदय
- सुबह 6:02
- सूर्यास्त
- शाम 6:35
समय नई दिल्ली (IST) के अनुसार हैं। अपने शहर का समय ऊपर शहर बदलकर देखें।
दूसरे वर्ष
राधा अष्टमी 2026: तिथि और समय
- तारीख
- शनिवार, 19 सितंबर 2026
- तिथि
- भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
- अष्टमी प्रारंभ
- 18 सितंबर, दोपहर 1:02
- अष्टमी समाप्त
- 19 सितंबर, दोपहर 3:28
- सूर्योदय
- सुबह 6:08
- सूर्यास्त
- शाम 6:21
कैसे मनाएं
- बहुत से भक्त दोपहर की पूजा तक या पूरे दिन व्रत रखते हैं।
- दोपहर में राधा जी की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र और श्रृंगार किया जाता है।
- फूल और मिठाई अर्पित करके आरती की जाती है।
- प्रसाद से व्रत खोला जाता है और शाम भजन-कीर्तन में बीतती है।
आपकी कुंडली के लिए
अपनी जन्म की जानकारी जोड़ें और देखें कि Radha Ashtami आपके जन्म नक्षत्र या जन्म तिथि से मेल खाता है या नहीं।
Radha Ashtami के बाद आने वाले त्योहार
राधा अष्टमी के बारे में
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को राधा अष्टमी मनाई जाती है, जन्माष्टमी के ठीक दो सप्ताह बाद। राधा रानी को वृषभानु जी और कीर्ति जी की बेटी के रूप में याद किया जाता है। ब्रज में वे केवल कृष्ण की प्रिया ही नहीं, भक्ति का साक्षात रूप मानी जाती हैं। भक्त कहते हैं कि कृष्ण की पूजा राधा के बिना अधूरी है, इसीलिए 'राधे कृष्ण' में पहले राधा का नाम आता है।
परंपरा के अनुसार राधा जी का जन्म गोकुल के पास रावल गांव में हुआ और उनका बचपन बरसाना में बीता, जहां पहाड़ी पर श्रीजी का मंदिर है, जिसे लाडली जी का मंदिर भी कहते हैं। इस दिन बरसाना श्रद्धालुओं से भर जाता है। मंदिर में अभिषेक, श्रृंगार और भोग के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है और गलियों में बधाई गीत और कीर्तन गूंजते हैं। वृंदावन, मथुरा और रावल में भी अपने-अपने ढंग से उत्सव होता है, और देश-विदेश के कृष्ण मंदिरों में भी यह दिन मनाया जाता है।
जन्माष्टमी की तरह राधा अष्टमी की मुख्य पूजा भी दोपहर में होती है, क्योंकि माना जाता है कि राधा जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था। राधा जी की प्रतिमा को, अक्सर कृष्ण के साथ, पंचामृत यानी दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराया जाता है, फिर नए वस्त्र और गहने पहनाकर फूल और मिठाई अर्पित की जाती है। बहुत से भक्त दोपहर की पूजा तक या पूरे दिन व्रत रखते हैं और प्रसाद लेकर व्रत खोलते हैं। शाम को भजन, कीर्तन और राधा जी की लीलाओं की कथा होती है।
जो परिवार जन्माष्टमी रखते हैं, उनमें से कई राधा अष्टमी को उसी का साथी पर्व मानकर रखते हैं। व्रत के नियम हर घर में अलग होते हैं: कोई अन्न छोड़कर व्रत रखता है, कोई फल और दूध लेकर, और कोई बस मंदिर के उत्सव में शामिल होता है। ऊपर दी गई तारीख दोपहर के समय की अष्टमी तिथि पर आधारित है।
